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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस पर कई बार ज़ोर दिया है. लेकिन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को हर साल प्रतिस्पर्धा के लिए रैंक करने वाले आईएमडी विश्व प्रतिस्पर्धा केंद्र के निदेशक और वित्त मामलों के प्रोफेसर आर्तुरो ब्रिस के अनुसार कोरोना वायरस के कारण भारत जैसे कई देश डिग्लोबलाइज़ेशन (दुनिया के दूसरे बाज़ारों से कटने की चाहत) की तरफ़ जा रहे हैं

गलवान घाटी तनाव: चीन की कंपनी ने भारत में किया 100 करोड़

ट्रंप की कोशिशों के बावजूद अमरीकी कंपनियों ने चीन में अपनी फ़ैक्टरियों में ताला नहीं लगाया है. हाँ कुछ कंपनियों ने चीन प्लस वन फ़ॉर्मूला ज़रूर अपनाया है, जिसका अर्थ ये है कि इन कंपनियों ने अपने उद्योग के कुछ हिस्सों को वियतनाम जैसे देशों में ले जाने का फ़ैसला किया है.

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महाराष्ट्र के उद्योग मंत्री सुभाष देसाई ने कहा, "दूसरे देशों के मुक़ाबले महाराष्ट्र में ज़्यादा निवेश और रोज़गार उपलब्ध होंगे. इन इंडस्ट्रीज़ के लिए 95,555 हेक्टेयर ज़मीन राज्य में रिज़र्व की गई है. कई तरह के लाइसेंस हासिल करने में लगने वाले वक़्त की बजाय अब केवल एक ही लाइसेंस लेना होगा और वह 98 घंटे में मिल जाएगा. साथ ही हम इंडस्ट्रियल वर्कर्स ब्यूरो भी स्थापित कर रहे हैं."

भारत-चीन तनाव: एशिया के दो क़द्दावर मुल्कों में तनाव बढ़ा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषांगिक संगठन स्वदेशी जागरण मंच का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत की बात चंद दिनों पहले ही की है. ऐसे में जब टाटा और एलएंडटी जैसी भारतीय कंपनियां टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा ले रही हैं तो किसी चीनी कंपनी को कॉन्ट्रैक्ट नहीं दिया जाना चाहिए.

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भारत का उदाहरण देते हुए वो कहते हैं, "इसका वैश्विक व्यापार में योगदान चीन की तुलना में काफ़ी कम है. भारत अब भी दुनिया के ट्रेड को आगे बढ़ाने की क्षमता रखता है."

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार भारत सरकार ने आयात किए जाने वाले 855 ऐसे सामानों की सूची तैयार की है, जिन पर टैरिफ बढाए जाने पर विचार किया जा रहा है.

चीन के प्रोफ़ेसर ह्वांग युंगसॉन्ग कहते हैं, "अगर भारत के चीन के साथ व्यापारिक संबंध बाधित होते हैं, तो संभावित लाभार्थी भारत और चीन के अलावा कोई भी देश हो सकता है. भौगोलिक रूप से कहें तो, अमरीका और उसके कुछ सहयोगी चीन और भारत को एक दूसरे के ख़िलाफ़ करने और भारत से दूरी देखकर ख़ुश होंगे. आर्थिक रूप से, आसियान और विकसित देशों के उत्पादक भारतीय बाज़ार में चीनी सामानों के बजाए अपने सामान बेचने में रुचि दिखा सकते हैं, लेकिन शायद कम दक्षता या उच्च लागत पर."

उनका मानना है कि ये इस समय का रुझान हो सकता है. उनका तर्क है कि अमरीका, यूरोप और भारत जैसे देश दो-तीन सालों के बाद वैश्वीकरण की तरफ़ फिर से लौटेंगे.

इनमें से कुछ कंपनियां भारत की हैं, जबकि कुछ अमरीका, चीन, साउथ कोरिया और सिंगापुर की हैं. एक्सोनमोबिल, यूपीएल, पीएमआई इलेक्ट्रो मोबाइल सॉल्यूशंस, फ़ोटोन मोटर और वरुण बेवरेजेज इन कंपनियों में शुमार हैं.

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