कोई दाल फ्राई नहीं, मोदी सरकार की खाद्य सहायता के नए राउंड

दो राज्य विकल्प मूल्य निर्धारण मॉडल सूत्र

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अभी तक मंडी में पहुंचने के बाद सही मूल्य न मिलने पर भी किसान फसल बेचने को मजबूर होता था, क्योंकि वापसी का भाड़ा देना और नुकसानदायक होता। यदि फसल जल्द खराब होने वाली उपज हो तो मंडी पहुंचने के बाद उसे किसी भी मूल्य पर बेचने की मजबूरी होती है। किसान की इसी मजबूरी का लाभ बेचौलिये उठाते रहे हैं। अब किसान अपने घर या खेत से उचित मूल्य मिलने पर ही फसल बेचेगा। किसानों को मंडियों की अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, लंबी कतारों, लंबे इंतजार से भी मुक्ति मिलेगी। प्रतिस्पर्धा के कारण इन मंडियों को भी अपनी व्यवस्था में सुधार करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

कृषि सुधारों के लिये दो अध्यादेश जारी, किसानों को पसंद के

8766 चना दाल पर इसलिए भी सहमति बन गई, चूंकि इसमें, पिछली बार वितरित की गई दूसरी दालों के मुकाबले, ज़्यादा मिलिंग और प्रॉसेसिंग की ज़रूरत नहीं पड़ती. मूंग, अरहर, उड़द और मसूर जैसी दूसरी दालों के विपरीत, जिन्हें प्रॉसेस करने में 5-7 दिन लगते हैं, इसे भिगोकर आसानी से पकाया जा सकता है. 8767

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मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 76 जून को केंद्र के बफर स्टॉक में लीख मीट्रिक टन (एलएमटी) दालें थीं जिनमें एलएमटी अरहर, एलएमटी मूंग, एलएमटी उड़द, एलएमटी चना, और एलएमटी मसूर दाल है. करोड़ घरों को पांच महीने तक, एक किलो दाल प्रति माह के हिसाब से, केंद्र सरकार को एलएमटी दालों की ज़रूरत है.

रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से, इसकी ख़रीद लागत भी सबसे सस्ती है जिससे ये सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए सबसे उपयुक्त हो जाती है, क्योंकि कम दाम की वजह से इसकी जमाख़ोरी का ख़तरा कम रहता है.

दूसरा अध्यादेश अनुबंध कृषि से संबंधित है जो फसल की बुआई से पहले किसान को अपनी फसल को तय मानकों और तय कीमत के अनुसार बेचने का अनुबंध करने की सुविधा प्रदान करता है। इससे किसान एक तो फसल तैयार होने पर सही मूल्य न मिलने के जोखिम से बच जाएंगे, दूसरे उन्हें खरीदार ढूंढने के लिए कहीं जाना नहीं होगा। किसान सीधे थोक और खुदरा विक्रेताओं, निर्यातकों, प्रसंस्करण उद्योगों आदि के साथ उनकी आवश्यकताओं और गुणवत्ता के अनुसार फसल उगाने के अनुबंध कर सकते हैं। इससे किसानों को फसल उगाने से पहले ही सुनिश्चित दामों पर फसल का खरीददार तैयार मिलेगा। इसमें किसानों की जमीन के मालिकाना अधिकार सुरक्षित रहेंगे और उसकी मर्जी के खिलाफ फसल उगाने की कोई बाध्यता भी नहीं होगी। इसमें फसल खराब होने के जोखिम से भी किसान का बचाव होगा।

ये कहानी सिर्फ रविंदर सिंह की ही नहीं है बल्कि देश, खासकर उत्तर प्रदेश, के कई किसानों को इसी तरह की कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

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किसानों को यह भी समझना होगा कि नई व्यवस्था एक नया विकल्प है, जो वर्तमान मंडी व्यवस्था के साथ-साथ चलता रहेगा। हमारा कृषि क्षेत्र लगभग आधी आबादी को रोजगार देता है। देश की कृषि जीडीपी लगभग 85 लाख करोड़ रुपये की है, पर देश की जीडीपी में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी मात्र 65 प्रतिशत है। साफ है कि कृषि क्षेत्र में सुधारों का असर आधी आबादी की आय पर पड़ेगा।

एक समान विकल्प से दालों का बंदोबस्त करने में होने वाली देरी भी कम की जा सकती है जो राज्यों की अलग-अलग पसंद की वजह से अप्रैल से जून के बीच में देखी गई थी.

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